Sbg 14.26 htshg

From IKS BHU
Revision as of 15:16, 4 December 2025 by imported>Vij (Added {content_identifier} content)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।14.26।।मनुष्य इन तीनों गुणोंसे किस प्रकार अतीत होता है इस प्रश्नका उत्तर अब देते हैं --, जो संन्यासी या कर्मयोगी सब भूतोंके हृदयमें स्थित मुझ परमेश्वर नारायणको? कभी व्यभिचरित ( विचलित ) न होनेवाले अव्यभिचारी भक्तियोगद्वारा सेवन करता है -- भजनका नाम भक्ति है? वही योग है? उस भक्तियोगके द्वारा जो मेरी सेवा करता है -- वह इन ऊपर कहे हुए गुणोंको अतिक्रमण करके ब्रह्मलोकको पानेके लिये? अर्थात् मोक्ष प्राप्त करनेके लिये योग्य समझा जाता है? अर्थात् ( मोक्ष प्राप्त करनेमें ) समर्थ होता है।