Sbg 14.26 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।14.26।।मनुष्य इन तीनों गुणोंसे किस प्रकार अतीत होता है इस प्रश्नका उत्तर अब देते हैं --, जो संन्यासी या कर्मयोगी सब भूतोंके हृदयमें स्थित मुझ परमेश्वर नारायणको? कभी व्यभिचरित ( विचलित ) न होनेवाले अव्यभिचारी भक्तियोगद्वारा सेवन करता है -- भजनका नाम भक्ति है? वही योग है? उस भक्तियोगके द्वारा जो मेरी सेवा करता है -- वह इन ऊपर कहे हुए गुणोंको अतिक्रमण करके ब्रह्मलोकको पानेके लिये? अर्थात् मोक्ष प्राप्त करनेके लिये योग्य समझा जाता है? अर्थात् ( मोक्ष प्राप्त करनेमें ) समर्थ होता है।