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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।9.9।।तब तो भूतसमुदायको विषम रचनेवाले आप परमेश्वरका उस विषम रचनाजनित पुण्यपापसे भी सम्बन्ध होता ही होगा ऐसी शङ्का होनेपर भगवान् ये वचन बोले --, हे धनंजय भूतसमुदायकी विषम रचनानिमित्तक वे कर्म? मुझ ईश्वरको बन्धनमें नहीं डालते। उन कर्मोंका सम्बन्ध न होनेमें कारण बतलाते हैं -- मैं उन कर्मोंमें उदासीनकी भाँति स्थित रहता हूँ अर्थात् आत्मा निर्विकार है? इसलिये जैसे कोई उदासीन -- उपेक्षा करनेवाला स्थित हो उसीकी भाँति मैं स्थित रहता हूँ। तथा उन कर्मोंमें फलसम्बन्धी आसक्तिसे और मैं करता हूँ इस अभिमानसे भी मैं रहित हूँ ( इस कारण वे कर्म मुझे नहीं बाँधते )। इससे यह अभिप्राय समझ लेना चाहिये कि कर्तापनके अभिमानका अभाव और फलसम्बन्धी आसक्तिका अभाव दूसरोंको भी बन्धनरहित कर देनेवाला है। इसके सिवा अन्य प्रकारसे किये हुए कर्मोंद्वारा मूर्खलोग कोशकार ( रेशमके कीड़े ) की भाँति बन्धनमें पड़ते हैं।
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