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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।9.18।।तथा मैं ही --, गति -- कर्मफल? भर्ता -- सबका पोषण करनेवाला? प्रभु -- सबका स्वामी? प्राणियोंके कर्म और अकर्मका साक्षी? जिसमें प्राणी निवास करते हैं वह वासस्थान? शरण अर्थात् शरणमें आये हुए दुःखियोंका दुःख दूर करनेवाला? सुहृत् -- प्रत्युपकार न चाहकर उपकार करनेवाला? प्रभव -- जगत्की उत्पत्तिका कारण और,जिसमें सब लीन हो जाते हैं वह प्रलय भी मैं ही हूँ। तथा जिसमें सब स्थित होते हैं वह स्थान? प्राणियोंके कालान्तरमें उपभोग करनेयोग्य कर्मोंका भण्डाररूप निधान और अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ अर्थात् उत्पत्तिशील वस्तुओंकी उत्पत्तिका अविनाशी कारण मैं ही हूँ। जबतक संसार है तबतक उसका बीज भी अवश्य रहता है? इसलिये बीजको अविनाशी कहा है क्योंकि बिना बीजके कुछ भी उत्पन्न नहीं होता और उत्पत्ति नित्य देखी जाती है? इससे यह जाना जाता है कि बीजकी परम्पराका नाश नहीं होता।