Sbg 8.8 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।8.8।।तथा --, हे पार्थ अभ्यासयोगयुक्त अनन्यगामी चित्तद्वारा अर्थात् चित्तसमर्पणके आश्रयभूत मुझ एक परमात्मामें ही विजातीय प्रतीतियोंके व्यवधानसे रहित तुल्य प्रतीतिकी आवृत्तिका नाम अभ्यास है वह अभ्यास ही योग है ऐसे अभ्यासरूप योगसे युक्त उस एक ही आलम्बनमें लगा हुआ विषयान्तरमें न जानेवाला जो योगीका चित्त है उस चित्तद्वारा शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार चिन्तन करता हुआ योगी परम निरतिशय -- दिव्य पुरुषको -- जो आकाशस्थ सूर्यमण्डलमें परम पुरुष है -- उसको प्राप्त होता है।