Sbg 8.6 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।8.6।।केवल मेरे विषयमें ही यह नियम नहीं है किंतु --, हे कुन्तीपुत्र प्राणवियोगके समय ( यह जीव ) जिसजिस भी भावका अर्थात् ( जिस किसी भी ) देवताविशेषका चिन्तन करता हुआ शरीर छोड़ता है उस भावसे भावित हुआ वह पुरुष सदा उस स्मरण किये हुए भावको ही प्राप्त होता है अन्यको नहीं। उपास्य देवविषयक भावनाका नाम तद्भाव है वह जिसने भावित यानी बारंबार चिन्तन करनेके द्वारा अभ्यस्त किया हो उसका नाम तद्भावभावित है ऐसा होता हुआ ( उसीको प्राप्त होता है )।