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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।8.24।।यहाँ अग्नि कालाभिमानी देवताका वाचक है तथा ज्योति भी कालाभिमानी देवताका ही वाचक है अथवा अग्नि और ज्योति नामवाले दोनों प्रसिद्ध वैदिक देवता ही हैं। जिस वनमें आमके पेड़ अधिक होते हैं उसको जैसे आमका वन कहते हैं उसी प्रकार यहाँ कालाभिमानी देवताओंका वर्णन अधिक होनेसे यत्र काले तं कालम् इत्यादि कालवाचक शब्दोंका प्रयोग किया गया है। ( अभिप्राय यह कि जिस मार्गमें अग्निदेवता ज्योतिदेवता ) दिनका देवता शुक्लपक्षका देवता और उत्तरायणके छः महीनोंका देवता है उस मार्गमें ( अर्थात् उपर्युक्त देवताओंके अधिकारमें ) मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ता यानी ब्रह्मकी उपासनामें तत्पर हुए पुरुष क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यहाँ उत्तरायण मार्ग भी देवताका ही वाचक हैं क्योंकि अन्यत्र ( ब्रह्मसूत्रमें ) भी यही न्याय माना गया है। जो पूर्ण ज्ञाननिष्ठ सद्योमुक्ितके पात्र होते हैं उनका आनाजाना कहीं नहीं होता श्रुति भी कहती है उसके प्राण निकलकर कहीं नहीं जाते। वे तो ब्रह्मसंलीनप्राण अर्थात् ब्रह्ममय -- ब्रह्मरूप ही हैं।