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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।7.27।।आपका तत्त्व जाननेमें ऐसा कौन प्रतिबन्धक है जिससे मोहित हुए सभी उत्पत्तिशील प्राणी आपको नहीं जान पाते यह जाननेकी इच्छा होनेपर कहते हैं इच्छा और द्वेष इन दोनोंसे जो उत्पन्न होता है उसका नाम इच्छाद्वेषसमुत्थ है उससे ( प्राणी मोहित होते हैं। ) वह कौन है ऐसी विशेष जिज्ञासा होनेपर यह कहते हैं द्वन्द्वोंके निमित्तसे होनेवाला जो मोह है उस द्वन्द्वमोहसे ( सब मोहित होते हैं )। शीत और उष्णकी भाँति परस्परविरुद्ध ( स्वभाववाले ) और सुखदुःख तथा उनके कारणोंमें रहनेवाले वे इच्छा और द्वेष ही यथासमय सब भूतप्राणियोंसे सम्बन्धयुक्त होकर द्वन्द्व नामसे कहे जाते हैं। सो ये इच्छा और द्वेष जब इस प्रकार सुखदुःख और उनके कारणकी प्राप्ति होनेपर प्रकट होते हैं तब वे सब भूतोंकी बुद्धिको अपने वशमें करके परमार्थतत्त्वविषयक ज्ञानकी उत्पत्तिका प्रतिबन्ध करनेवाले मोहको उत्पन्न करते हैं। जिसका चित्त इच्छाद्वेषरूप दोषोंके वशमें फँस रहा है उसको बाहरी विषयोंके भी यथार्थ तत्त्वका ज्ञान प्राप्त नहीं होता फिर उन दोनोंसे जिसकी बुद्धि आच्छादित हो रही है ऐसे मूढ़ पुरुषको अनेकों प्रतिबन्धोंवाले अन्तरात्माके सम्बन्धमें ज्ञान नहीं होता इसमें तो कहना ही क्या है इसलिये हे भारत अर्थात् भरतवंशमें उत्पन्न अर्जुन उस इच्छाद्वेषजन्य द्वन्द्वनिमित्तक मोहके द्वारा मोहित हुए समस्त प्राणी हे परंतप जन्मकालमें उत्पन्न होते ही मूढ़भावमें फँस जाते हैं। अभिप्राय यह है कि उत्पत्तिशील समस्त प्राणी मोहके वशीभूत हुए ही उत्पन्न होते हैं। ऐसा होनेके कारण द्वन्द्वमोहसे जिनका ज्ञान प्रतिबद्ध हो गया है वे मोहित हुए समस्त प्राणी अपने आत्मारूप मुझ ( परमात्मा ) को नहीं जानते और इसीलिये वे आत्मभावसे मुझे नहीं भजते।