Sbg 7.17 htshg

From IKS BHU
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।7.17।।उन चार प्रकारके भक्तोंमें जो ज्ञानी है अर्थात् यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला है वह तत्त्ववेत्ता होनेके कारण सदा मुझमें स्थित है और उसकी दृष्टिमें अन्य किसी भजनेयोग्य वस्तुका अस्तित्व न रहनेके कारण वह केवल एक मुझ परमात्मामें ही अनन्य भक्तिवाला होता है। इसलिये वह अनन्य प्रेमी ( ज्ञानी भक्त ) श्रेष्ठ माना जाता है। ( अन्य तीनोंकी अपेक्षा ) अधिक उच्च कोटिका समझा जाता है। क्योंकि मैं ज्ञानीका आत्मा हूँ इसलिये उसको अत्यन्त प्रिय हूँ। संसारमें यह प्रसिद्ध ही है कि आत्मा ही प्रिय होता है। इसलिये ज्ञानीका आत्मा होनेके कारण भगवान् वासुदेव उसे अत्यन्त प्रिय होता है। यह अभिप्राय है। तथा वह ज्ञानी भी मुझ वासुदेवका आत्मा ही है अतः वह मेरा अत्यन्त प्रिय है।