Sbg 6.4 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.4।।साधक कब योगारूढ़ हो जाता है यह अब बतलाते हैं चित्तका समाधान कर लेनेवाला योगी जब इन्द्रियोंके अर्थोंमें अर्थात् इन्द्रियोंके विषय जो शब्दादि हैं उनमें एवं नित्य नैमित्तिक काम्य और निषिद्ध कर्मोंमें अपना कुछ भी प्रयोजन न देखकर आसक्त नहीं होता उनमें आसक्ति यानी ये मुझे करने चाहिये ऐसी बुद्धि नहीं करता। तब उस समय वह सब संकल्पोंका त्यागी अर्थात् इस लोक और परलोकके भोगोंकी कामनाके कारणरूप सब संकल्पोंका त्याग करना जिसका स्वभाव हो चुका है ऐसा पुरुष योगारूढ़ यानी योगको प्राप्त हो चुका है ऐसे कहा जाता है। सर्वसंकल्पसंन्यासी इस कथनका यह आशय है कि सब कामनाओंको और समस्त कर्मोंको छोड़ देना चाहिये। क्योंकि सब कामनाओंका मूल संकल्प ही है। स्मृतिमें भी कहा है कि कामका मूल कारण संकल्प ही है। समस्त यज्ञ संकल्पसे उत्पन्न होते हैं। हे काम मैं तेरे मूल कारणको जानता हूँ। तू निःसन्देह संकल्पसे ही उत्पन्न होता है। मैं तेरा संकल्प नहीं करूँगा अतः फिर तू मूझे प्राप्त नहीं होगा। सब कामनाओंके परित्यागसे ही सर्व कर्मोंका त्याग सिद्ध हो जाता है। यह बात वह जैसी कामनावालाहोता है वैसे ही निश्चयवाला होता है जैसे निश्चयवाला होता है वही कर्म करता है इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित है और जीव जोजो कर्म करता है वह सब कामकी ही चेष्टा है। इत्यादि स्मृतिसे भी प्रमाणित है। युक्तिसे भी यही बात सिद्ध होती है क्योंकि सब संकल्पोंका त्याग कर देनेपर तो कोई जरासा हिल भी नहीं सकता। सुतरां सर्वसंकल्पसंन्यासी कहकर भगवान् समस्त कामनाओंका और समस्त कर्मोंका त्याग कराते हैं।