Sbg 6.26 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.26।।इस प्रकार मनको आत्मामें स्थित करनेमें लगा हुआ योगी स्वाभाविक दोषके कारण जो अत्यन्त चञ्चल है तथा इसीलिये जो अस्थिर है ऐसा मन जिसजिस शब्दादि विषयके निमित्तसे विचलित होता है बाहर जाता है उसउस शब्दादि विषयरूप निमित्तसे ( इस मनको ) रोककर एवं उसउस विषयरूप निमित्तको यथार्थ तत्त्वनिरूपणद्वारा आभासमात्र दिखाकर वैराग्यकी भावनासे इस मनका ( बारंबार ) आत्मामें ही निरोध करे अर्थात् इसे आत्माके ही वशीभूत किया करे। इस प्रकार योगाभ्यासके बलसे योगीका मन आत्मामें ही शान्त हो जाता है।