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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.16।।अब योगीके आहार आदिके नियम कहे जाते हैं अधिक खानेवालेका अर्थात् अपनी शक्तिका उल्लङ्घन करके शक्तिसे अधिक भोजन करनेवालाका योग सिद्ध नहीं होता और बिल्कुल न खानेवालेका भी योग सिद्ध नहीं होता क्योंकि यह श्रुति है कि जो अपने शरीरकी शक्तिके अनुसार अन्न खाया जाता है वह रक्षा करता है वह कष्ट नहीं देता ( बिगाड़ नहीं करता ) जो उससे अधिक होता है वह कष्ट देता है और जो प्रमाणसे कम होता है वह रक्षा नहीं करता। इसलिये योगीको चाहिये कि अपने लिये जितना उपयुक्त हो उससे कम या ज्यादा अन्न न खाय। अथवा यह अर्थ समझो कि योगीके लिये योगशास्त्रमें बतलाया हुआ जो अन्नका परिमाण है उससे अधिक खानेवालेका योग सिद्ध नहीं होता। वहाँ यह परिमाण बतलाया है कि पेटका आधा भाग अर्थात् दो हिस्से तो शाकपात आदि व्यञ्जनोंसहित भोजनसे और तीसरा हिस्सा जलसे पूर्ण करना चाहिये तथा चौथा वायुके आनेजानेके लिये खाली रखना चाहिये इत्यादि। तथा हे अर्जुन न तो बहुत सोनेवालेका ही योग सिद्ध होता है और न अधिक जागनेवालेको ही योगसिद्धि प्राप्त होती है।