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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.14।।तथा प्रशान्तात्मा अच्छी प्रकारसे शान्त हुए अन्तःकरणवाला विगतभी निर्भय और ब्रह्मचारियोंके व्रतमें स्थित हुआ अर्थात् ब्रह्मचर्य गुरुसेवा भिक्षाभोजन आदि जो ब्रह्मचारीके व्रत हैं उनमें स्थित हुआ उनका अनुष्ठान करनेवाला होकर और मनका संयम करके अर्थात् मनकी वृत्तियोंका उपसंहार करके तथा मुझमें चित्तवाला अर्थात् मुझ परमेश्वरमें ही जिसका चित्त लग गया है ऐसा मच्चित्त होकर तथा समाहितचित्त होकर और मुझे ही सर्वश्रेष्ठ माननेवाला अर्थात् मैं ही जिसके मतमें सबसे श्रेष्ठ हूँ ऐसा होकर बैठे। कोई स्त्रीप्रेमी स्त्रीमें चित्तवाला हो सकता है परंतु वह स्त्रीको सबसे श्रेष्ठ नहीं समझता। तो किसको समझता है वह राजाको या महादेवको स्त्रीकी अपेक्षा श्रेष्ठ समझता है परंतु यह साधक तो चित्त भी मुझमें ही रखता है और मुझे ही सबसे अधिक श्रेष्ठ भी समझता है।