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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।5.21।।और भी वह ब्रह्ममें स्थित हुआ पुरुष ( कैसा होता है सो बताते हैं ) जिनका इन्द्रियोंद्वारा स्पर्श ( ज्ञान ) किया जा सके वे स्पर्श हैं इस व्युत्पत्तिसे शब्दादि विषयोंका नाम स्पर्श है ( वे सब अपने भीतर नहीं हैं इसलिये बाह्य हैं ) उस बाह्य स्पर्शोंमें जिसका अन्तःकरण आसक्त नहीं है ऐसा विषयप्रीतिसे रहित पुरुष उस सुखको प्राप्त होता है जो अपने भीतर है। तथा वह ब्रह्मयोगयुक्तात्मा ब्रह्ममें जो समाधि है उसका नाम ब्रह्मयोग है उस ब्रह्मयोगसे जिसका अन्तःकरण युक्त है अच्छी प्रकार उसमें समाहित है लगा हुआ है ऐसा पुरुष अक्षय सुखको अनुभव करता है प्राप्त होता है। इसलिये अपनेआप अक्षय सुख चाहनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह क्षणिक बाह्य विषयोंकी प्रीतिसे इन्द्रियोंको हटा ले। यह अभिप्राय है।