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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।5.18।।जिनके आत्माका अज्ञान ज्ञानद्वारा नष्ट हो चुका है वे पण्डितजन परमार्थतत्त्वको कैसे देखते हैं सो कहते हैं विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणमें अर्थात् विद्याआत्मबोध और विनयउपरामता इन दोनों गुणोंसे सम्पन्न जो विद्वान् और विनीत ब्राह्मण है उस ब्राह्मणमें गौमें हाथीमें कुत्ते और चाण्डालमें भी पण्डितजन समभावसे देखनेवाले ( होते हैं )। अभिप्राय यह कि उत्तम प्राणी संस्कारयुक्त विद्याविनयसम्पन्न सात्त्विक ब्राह्मणमें मध्यम प्राणीसंस्काररहित रजोगुणयुक्त गौमें और ( कनिष्ठ प्राणी ) अतिशय मूढ़ केवल तमोगुणयुक्त हाथी आदिमें सत्त्वादि गुणोंसे और उनके संस्कारोंसे तथा राजस और तामस संस्कारोंसे सर्वथा ही निर्लेप रहनेवाले सम एक निर्विकार ब्रह्मको देखना ही जिनका स्वभाव है वे पण्डित समदर्शी हैं। पू 0 वे ( इस प्रकार देखनेवाले ) दोषयुक्त हैं उनका अन्न भोजन करने योग्य नहीं क्योंकि यह स्मृतिका प्रमाण है कि समान गुणशीलवालोंकी विषम पूजा करनेसे और विषम गुणशीलवालोंकी सम पूजा करनेसे ( यजमान दोषी होता है )।