Sbg 5.14 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।5.14।।देहादिका स्वामी आत्मा न तो तू अमुक कर्म कर इस प्रकार लोगोंके कर्तापनको उत्पन्न करता है और न रथ घट महल आदि कर्म जो अत्यन्त इष्ट हैं उनको रचता है तथा न रथादि बनानेवालेका उसके कर्मफलके साथ संयोग ही रचता है यदि यह देहादिका स्वामी आत्मा स्वयं कुछ भी नहीं करताकराता तो फिर यह सब कौन कर रहा और करा रहा है इसपर कहते हैं स्वभाव ही बर्तता है अर्थात् जो अपना भाव है अविद्या जिसका स्वरूप है जो दैवी हि इत्यादि श्लोकोंसे आगे कही जानेवाली है वह प्रकृति यानी माया ही सब कुछ कर रही है।