Sbg 5.11 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।5.11।।उसके कर्मोंका फल तो केवल अन्तःकरणकी शुद्धिमात्र ही होता है क्योंकि योगी लोग केवल यानी मैं सब कर्म ईश्वरके लिये ही करता हूँ अपने फलके लिये नहीं। इस भावसे जिनमें ममत्वबुद्धि नहीं रही है ऐसे शरीर मन बुद्धि और इन्द्रियोंसे फलविषयक आसक्तिको छोड़कर आत्मशुद्धिके लिये अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं। सभी क्रियाओंमें ममताका निषेध करनेके लिये केवल शब्दका काया आदि सभी शब्दोंके साथ सम्बन्ध है। तेरा भी उसीमें अधिकार है इसलिये तू भी कर्म ही कर।