Sbg 4.34 htshg

From IKS BHU
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।4.34।।इस प्रकारसे श्रेष्ठ बतलाया हुआ वह ज्ञान किस उपायसे मिलता है सो कहते हैं वह ज्ञान जिस विधिसे प्राप्त होता है वह तू जान यानी सुन आचार्यके समीप जाकर भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करनेसे एवं किस तरह बन्धन हुआ कैसे मुक्ति होगी विद्या क्या है अविद्या क्या है इस प्रकार ( निष्कपट भावसे ) प्रश्न करनेसे और गुरुकी यथायोग्य सेवा करनेसे ( वह ज्ञान प्राप्त होता है )। अभिप्राय यह कि इस प्रकार सेवा और विनय आदिसे प्रसन्न हुए तत्त्वदर्शी ज्ञानी आचार्य तुझे उपर्युक्त विशेषणोंवाले ज्ञानका उपदेश करेंगे। ज्ञानवान् भी कोईकोई ही यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले होते हैं सब नहीं होते। इसलिये ज्ञानीके साथ तत्त्वदर्शी यह विशेषण लगाया है। इससे भगवान्का यह अभिप्राय है कि जो यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले होते हैं उनके द्वारा उपदेश किया हुआ ही ज्ञान अपने कार्यको सिद्ध करनेमें समर्थ होता है दूसरा नहीं।