Sbg 4.27 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।4.27।।तथा दूसरे साधक इन्द्रियोंके सम्पूर्ण कर्मोंको और शरीरके भीतर रहनेवाला वायु जो प्राण कहलाता है उसके संकुचित होने फैलने आदि कर्मोंको ज्ञानसे प्रकाशित हुई आत्मसंयमरूप योगाग्निमें हवन करते हैं। आत्मविषयक संयमका नाम आत्मसंयम है वही यहाँ योगाग्नि है। घृतादि चिकनी वस्तुसे प्रज्वलित हुई अग्निकी भाँति विवेकविज्ञानसे उज्ज्वलताको प्राप्त हुई ( धारणाध्यानसमाधिरूप ) उस आत्मसंयम योगाग्निमें ( वे प्राण और इन्द्रियोंके कर्मोंको ) विलीन कर देते हैं।