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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।4.25।।उपर्युक्त श्लोकमें यथार्थ ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन करके अब उसकी स्तुति करनेके लिये दैवम् एव इत्यादि श्लोकोंसे दूसरेदूसरे यज्ञोंका भी उल्लेख किया जाता है जिस यज्ञके द्वारा देवोंका पूजन किया जाता है वह देवसम्बन्धी यज्ञ है अन्य ( कितने ही ) योगी अर्थात् कर्म करनेवाले लोग उस दैवयज्ञका ही अनुष्ठान किया करते हैं। अन्य ( ब्रह्मवेत्ता पुरुष ) ब्रह्माग्निमें ( हवन करते हैं ) अर्थात् ब्रह्म सत्यज्ञानअनन्तस्वरूप है विज्ञान और आनन्द ही ब्रह्म है जो साक्षात् अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) है वह ब्रह्म है जो सर्वान्तर आत्मा है वह ब्रह्म है इत्यादि वचनोंसे जिसका वर्णन किया गया है जो भूखप्यास आदि समस्त सांसारिक धर्मोंसे रहित है जो ऐसा नहीं ऐसा नहीं इस प्रकार वेदवाक्योंद्वारा सब विशेषणोंसे परे बतलाया गया है वह ब्रह्म शब्दसे कहा जाता है। हवनका अधिकरण बतलानेके लिये उस ब्रह्मको ही यहाँ अग्नि कह दिया है। उस ब्रह्मरूप अग्निमें कितने ही ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी यज्ञद्वारा यज्ञको हवन करते हैं। आत्माके नामोंमें यज्ञ शब्दका पाठ होनेसे आत्माका नाम यज्ञ है जो कि वास्तवमें परब्रह्म ही है परंतु बुद्धि आदि उपाधियोंसे युक्त हुआ उपाधियोंके धर्मोंको अपनेमें मान रहा है। उस आहुतिरूप आत्माको उपर्युक्त आत्माद्वारा ही हवन करते हैं। सारांश यह कि उपाधियुक्त आत्माको जो उपाधिरहित परब्रह्मरूपसे साक्षात् करना है वही उसका उसमें हवन करना है ब्रह्म और आत्माके एकत्वज्ञानमें स्थित हुए वे संन्यासी लोग ऐसा हवन किया करते हैं। श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप इत्यादि श्लोकोंसे स्तुति करनेके लिये यह सम्यग्दर्शनरूप यज्ञ ब्रह्मार्पणम् इत्यादि श्लोकोंद्वारा दैवयज्ञ आदि यज्ञोंमें सम्मिलित किया जाता है।