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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।4.22।।जिसने समस्त संग्रहका त्याग कर दिया है ऐसे संन्यासीके पास शरीरनिर्वाहके कारणरूप अन्नादिका संग्रह नहीं होता इसलिये उसको याचनादिद्वारा शरीरनिर्वाह करनेकी योग्यता प्राप्त हुई। इसपर बिना याचना किये बिना संकल्पके अथवा बिना इच्छा किये प्राप्त हुए इत्यादि वचनोंसे जो शास्त्रमें संन्यासीके शरीरनिर्वाहके लिये अन्नादिकी प्राप्तिके द्वार बतलाये गये हैं उनको प्रकट करते हुए कहते हैं जो बिना माँगे अपनेआप मिले हुए पदार्थसे संतुष्ट है अर्थात् उसीमें जिसके मनका यह भाव हो जाता है कियही पर्याप्त है जो द्वन्द्वोंसे अतीत है अर्थात् शीतउष्ण आदि द्वन्द्वोंसे सताये जानेपर भी जिसके चित्तमें विषाद नहीं होता जो ईर्ष्यासे रहित अर्थात् निर्वैरबुद्धिवाला है और जो अपनेआप प्राप्त हुए लाभकी सिद्धिअसिद्धिमें भी सम रहता है जो ऐसा शरीरस्थितिके हेतुरूप अन्नादिके प्राप्त होने या न होनेमें भी हर्षशोकसे रहित समदर्शी है और कर्मादिमें अकर्मादि देखनेवाला यथार्थ आत्मदर्शननिष्ठ एवं शरीरस्थितिमात्रके लिये किये जानेवाले और शरीरादिद्वारा होनेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंमें भी मैं कुछ नहीं करता गुण ही गुणोंमें बर्त रहे हैं इस प्रकार सदा देखनेवाला है वह यति अपनेमें कर्तापनका अभाव देखनेसे अर्थात् आत्माको अकर्ता समझ लेनेसे वास्तवमें भिक्षाटनादि कुछ भी कर्म नहीं करता है। ऐसा पुरुष लोकव्यवहारकी साधारण दृष्टिसे तो सांसारिक पुरुषोंद्वारा आरोपित किये हुए कर्तापनके कारण भिक्षाटनादि कर्मोंका कर्ता होता है। परंतु शास्त्रप्रमाण आदिसे उत्पन्न अपने अनुभवसे ( वस्तुतः ) वह अकर्ता ही रहता है। इस प्रकार दूसरोंद्वारा जिसपर कर्तापनका अध्यारोप किया गया है ऐसा वह पुरुष शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंको करता हुआ भी नहीं बँधता क्योंकि ज्ञानरूप अग्निद्वारा उसके ( समस्त ) बन्धनकारक कर्म हेतुसहित भस्म हो चुके हैं। यह पहले कहे हुएका ही अनुवादमात्र है।