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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।4.12।।यदि रागादि दोषोंका अभाव होनेके कारण सभी प्राणियोंपर आप ईश्वरकी दया समान है एवं आप सब फल देनेमें समर्थ भी हैं तो फिर सभी मनुष्य मुमुक्षु होकर यह सारा विश्व वासुदेवरूप है इस प्रकारके ज्ञानसे केवल आपको ही क्यों नहीं भजते इसका कारण सुन कर्मोंकी सिद्धि चाहनेवाले अर्थात् फलप्राप्तिकी कामना करनेवाले मनुष्य इस लोकमें इन्द्र अग्नि आदि देवोंकी पूजा किया करते हैं। श्रुतिमें कहा है कि जो अन्य देवताकी इस भावसे उपासना करता है कि वह ( देवता ) दूसरा है और मैं ( उपासक ) दूसरा हूँ वह कुछ नहीं जानता जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है। ऐसे उन भिन्नरूपसे देवताओंका पूजन करनेवाले फलेच्छुक मनुष्योंकी इस मनुष्यलोकमें ( कर्मसे उत्पन्न हुई ) सिद्धि शीघ्र ही हो जाती है क्योंकि मनुष्यलोकमें शास्त्रका अधिकार है ( यह विशेषता है )। क्षिप्रं हि मानुषे लोके इस वाक्यमें क्षिप्र विशेषणसे भगवान् अन्य लोकोंमें भी कर्मफलकी सिद्धि दिखलाते हैं। पर मनुष्यलोकमें वर्णआश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है यह विशेषता है। उन वर्णाश्रम आदिमें अधिकार रखनेवालोंके कर्मोंकी कर्मजनित फलसिद्धि शीघ्र होती है।