Sbg 3.6 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।3.6।।जो आत्मज्ञानी न होनेपर भी शास्त्रविहित कर्म नहीं करता उसका वह कर्म न करना बुरा है यह कहते हैं जो मनुष्य हाथ पैर आदि कर्मेन्द्रियोंको रोककर इन्द्रियोंके भोगोंको मनसे चिन्तन करता रहता है वह विमूढात्मा अर्थात् मोहित अन्तःकरणवाला मिथ्याचारी ढोंगी पापाचारी कहा जाता है।