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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।2.24।।ऐसा होनेके कारण
( यह आत्मा न कटनेवाला न जलनेवाला न गलनेवाला और न सूखनेवाला है )। आपसमें एक दूसरेका नाश कर देनेवाले पञ्चभूत इस आत्माका नाश करनेके लिये समर्थ नहीं है। इसलिये यह नित्य है।
नित्य होनेसे सर्वगत है। सर्वव्यापी होनेसे स्थाणु है अर्थात् स्थाणु ( ठूँठ ) की भाँति स्थिर है। स्थिर होनेसे यह आत्मा अचल है और इसीलिये सनातन है अर्थात् किसी कारणसे नया उत्पन्न नहीं हुआ है। पुराना है।
इन श्लोकोंमें पुनरुक्तिके दोषका आरोप नहीं करना चाहिये क्योकि न जायते म्रियते वा इस एक श्लोकके द्वारा ही आत्माकी नित्यता और निर्विकारता तो कही गयी फिर आत्माके विषयमें जो भी कुछ कहा जाय वह इस श्लोकके अर्थसे अतिरिक्त नहीं है। कोई शब्दसे पुनरुक्त है और कोई अर्थसे ( पुनरुक्त है )।
परंतु आत्मतत्त्व बड़ा दुर्बोध है सहज ही समझमें आनेवाला नहीं है इसलिये बारंबार प्रसंग उपस्थित करके दूसरेदूसरे शब्दोंसे भगवान् वासुदेव उसी तत्त्वका निरूपण करते हैं यह सोचकर कि किसी भी तरह वह अव्यक्त तत्त्व इन संसारी पुरुषोंके बुद्धिगोचर होकर संसारकी निवृत्तिका कारण हो।