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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।2.11।।इस प्रकार धर्मके विषयमें जिसका चित्त मोहित हो रहा है और जो महान् शोकसागरमें डूब रहा है ऐसे अर्जुनका बिना आत्मज्ञानके उद्धार होना असम्भव समझकर उस शोकसमुद्रसे अर्जुनका उद्धार करनेकी इच्छावाले भगवान् वासुदेव आत्मज्ञानकी प्रस्तावना करते हुए बोले
जो शोक करने योग्य नहीं होते उन्हें अशोच्य कहते हैं भीष्म द्रोण आदि सदाचारी और परमार्थरूपसे नित्य होनेके कारण अशोच्य हैं। उन न शोक करने योग्य भीष्मादिके निमित्त तू शोक करता है कि वे मेरे हाथों मारे जायँगे मैं उनसे रहित होकर राज्य और सुखादिका क्या करूँगा
तथा तू प्रज्ञावानोंके अर्थात् बुद्धिमानोंके वचन भी बोलता है अभिप्राय यह है कि इस तरह तू उन्मतकी भाँति मूर्खता और बुद्धिमत्ता इन दोनों परस्परविरुद्ध भावोंको अपनेमें दिखलाता है।
क्योंकि जिनके प्राण चले गये हैं जो मर गये हैं उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये जो जीते हैं उनके लिये भी पण्डित आत्मज्ञानी शोक नहीं करते।
पाण्डित्यको सम्पादन करके इस श्रुतिवाक्यानुसार आत्मविषयक बुद्धिका नाम पण्डा है और वह बुद्धि जिनमें हो वे पण्डित हैं।
परंतु परमार्थदृष्टिसे नित्य और अशोचनीय भीष्म आदि श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये तू शोक करता है अतः तू मढ है। यह अभिप्राय है।