Sbg 18.7 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.7।।अतः आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी मुमुक्षुके लिये --, विहित -- नित्यकर्मोंका संन्यास यानी परित्याग करना नहीं बन सकता? क्योंकि अज्ञानीके लिये नित्यकर्म शुद्धिके हेतु माने गये हैं। अतः मोहसे अज्ञानपूर्वक ( किया हुआ ) उन नित्यकर्मोंका परित्याग ( तामस कहा गया है )। नियत अवश्य कर्तव्यको कहते हैं? फिर उसका त्याग किया जाना अत्यन्त विरुद्ध है? अतः यह मोहनिमित्तक त्याग तामस कहा गया है। मोह ही तम है? यह प्रसिद्ध है।