Sbg 18.56 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.56।।अपने कर्मोंद्वारा भगवान्की पूजा करनारूप भक्तियोगकी सिद्धि? अर्थात् फल? ज्ञाननिष्ठाकी योग्यता है। जिस ( भक्तियोग ) से होनेवाली ज्ञाननिष्ठा? अन्तमें मोक्षरूप फल देनेवाली होती है? उस भगवद्भक्तियोगकी अब शास्त्राभिप्रायके उपसंहारप्रकरणमें? शास्त्रअभिप्रायके निश्चयको दृढ़ करनेके लिये स्तुति की जाती है --, सदा सब कर्मोंको करनेवाला अर्थात् निषिद्ध कर्मोंको भी करनेवाला जो मद्व्यपाश्रय भक्त है -- जिसका मैं वासुदेव ही पूर्ण आश्रय हूँ? ऐसा मुझे ही अपना सब कुछ अर्पण कर देनेवाला जो भक्त है? वह भी मुझ ईश्वरके अनुग्रहसे? विष्णुके शाश्वत -- नित्य -- अविनाशी पदको प्राप्त कर लेता है।