Sbg 18.54 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.54।।इस क्रमसे --, ब्रह्मको प्राप्त हुआ? प्रसन्नात्मा अर्थात् जिसको अध्यात्मप्रसाद लाभ हो चुका है ऐसा पुरुष? न शोक करता है और न आकाङ्क्षा ही करता है। अर्थात् न तो किसी पदार्थकी हानिके? या निजसम्बन्धी विगुणताके उद्देश्यसे सन्ताप करता है और न किसी वस्तुको चाहता ही है। न शोचति न काङ्क्षति इस कथनसे ब्रह्मभूत पुरुषके स्वभावका अनुवादमात्र किया गया है। क्योंकि ब्रह्मवेत्तामें अप्राप्त विषयोंकी आकाङ्क्षा बन ही नहीं सकती। अथवा न काङ्क्षति की जगह,न हृष्यति ऐसा पाठ समझना चाहिये। तथा जो सब भूतोंमें सम है अर्थात् अपने सदृश सब भूतोंमें सुख और दुःखको जो समान देखता है। इस वाक्यमें आत्माको समभावसे देखना नहीं कहा है क्योंकि वह तो भक्त्या मामभिजानाति इस पदसे आगे कहा जायगा। ऐसा ज्ञाननिष्ठ पुरुष? मुझ परमेश्वरकी भजनरूप पराभक्तिको पाता है? अर्थात् चतुर्विधा भजन्ते माम् इसमें जो चतुर्थ भक्ति कही गयी है उसको पाता है।