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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.52।।उसके बाद --, विविक्त देशका सेवन करनेवालाअर्थात् वन? नदीतीर? पहाड़की गुफा आदि एकान्त देशका सेवन करना ही जिसका स्वभाव है ऐसा? और हलका आहार करनेवाला होकर? एकान्तसेवन और हलका भोजन यह दोनों निद्रादि दोषोंके निवर्तक होनेसे चित्तकी स्वच्छतामें हेतु हैं? इसलिये इनका ग्रहण किया गया है। तथा मन? वाणी और शरीरको वशमें करनेवाला होकर? अर्थात् जिस ज्ञाननिष्ठ यतिके काया? मन और वाणी तीनों जीते हुए होते हैं? वह यतवाक्कायमानस होता है -- इस प्रकार सब इन्द्रियोंको कर्मोंसे उपराम करके? तथा नित्य ध्यानयोगके परायण रहता हुआ आत्मस्वरूपचिन्तनका नाम ध्यान है और आत्मामें चित्तको एकाग्र करनेका नाम योग है? यह दोनों प्रधानरूपसे जिसके कर्तव्य हों उसका नाम ध्यानयोगपरायण है? उसके साथ नित्य पदका ग्रहण मन्त्रजप आदि अन्य कर्तव्योंका अभाव दिखानेके लिये किया गया है। तथा इस लोक और परलोकके भोगोंमें तृष्णाका अभावरूप जो वैराग्य है? उसके आश्रित होकर अर्थात् सदा वैराग्यसम्पन्न होकर।