Sbg 18.50 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.50।।पूर्वोक्त स्वधर्मानुष्ठानद्वारा ईश्वरार्चनरूप साधनसे उत्पन्न हुई? ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिकी योग्यतारूप सिद्धिको? जो प्राप्त कर चुका है और जिसमें आत्मविषयक विवेकज्ञान उत्पन्न हो गया है? उस पुरुषको? जिस क्रमसे केवल आत्मज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि मिलती है? वह ( क्रम ) बतलाना है? अतः कहते हैं --, सिद्धिको प्राप्त हुआ? अर्थात् अपने कर्मोंद्वारा ईश्वरकी पूजा करके? उसकी कृपासे उत्पन्न हुई शरीर और इन्द्रियोंकी ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिका योग्यतारूप सिद्धिको प्राप्त हुआ पुरुष -- यह पुनरुक्ति आगे कहे जानेवाले वचनोंके साथ सम्बन्ध जो़ड़नेके लिये है। वे आगे कहे जानेवाले वचन कौनसे हैं जिनके लिये पुनरुक्ति है सो बतलाते हैं -- जिस ज्ञाननिष्ठारूप प्रकारसे ( साधक ब्रह्मको) -- परमात्माको पाता है? उस प्रकारको ? यानी ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिके क्रमको? तू मेरे वचनोंसे निश्चयपूर्वक समझ। क्या ( उसका ) विस्तारपूर्वक ( वर्णन करेंगे ) इसपर कहते हैं कि नहीं। हे कौन्तेय समाससे अर्थात् संक्षेपसे ही? जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है? उसे समझ। इस वाक्यसे जिस ब्रह्मप्राप्तिके लिये प्रतिज्ञा की थी? उसे इदंरूपसे ( स्पष्ट ) दिखानेके लिये कहते हैं कि ज्ञानकी जो परानिष्ठा है उसको सुन। अन्तिम अवधिपरिसमाप्तिका नाम निष्ठा है। ऐसी जो ब्रह्मज्ञानकी परमावधि है ( उसको सुन )। वह ( ब्रह्मज्ञानकी निष्ठा ) कैसी है जैसा कि आत्मज्ञान है। वह कैसा है जैसा आत्मा है। वह,( आत्मा ) कैसा है जैसा भगवान्ने बतलाया है तथा जैसा उपनिषद्वाक्योंद्वारा कहा गया है और जैसा न्यायसे सिद्ध है। पू 0 -- ज्ञान विषयाकार होता है? परंतु आत्मा न तो कहीं भी विषय माना जाता है और न आकारवान् ही। उ 0 -- किंतु आदित्यवर्ण प्रकाशस्वरूप स्वयंज्योति इस तरह आत्माका आकारवान् होना तो श्रुतिमें कहा है। पू 0 -- यह कहना ठीक नहीं क्योंकि वे वाक्य तमःस्वरूपत्वका निषेध करनेके लिये कहे गये हैं। अर्थात् आत्मामें द्रव्यगुण आदिके आकारका प्रतिषेध करनेपर जो आत्माके अन्धकाररूप माने जानेकी आशङ्का होती है? उसका प्रतिषेध करनेके लिये ही आदित्यवर्णम् इत्यादि वाक्य हैं क्योंकि अरूपम् आदि वाक्योंसे विशेषतः रूपका प्रतिषेध किया गया है और इसका ( आत्माका ) रूप इन्द्रियोंके सामने नहीं ठहरता? इसको ( आत्माको ) कोई भी आंखोंसे नहीं देख सकता यह अशब्द है? अस्पर्श है इत्यादि वचनोंसे भी आत्मा किसीका विषय नहीं है? यह बात कही गयी है। सुतरां जैसा आत्मा है वैसा ही ज्ञान है यह कहना युक्तियुक्त नहीं है। तब फिर आत्माका ज्ञान कैसे होता है क्योंकि सभी ज्ञान? जिसको विषय करते हैं उसीके आकारवाले होते हैं और आत्मा निराकार है ऐसा कहा है। फिर ज्ञान और आत्मा दोनों निराकार होनेसे उसमें भावना और निष्ठा कैसे हो सकती है उ 0 -- यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्माका अत्यन्त निर्मलत्व? स्वच्छत्व और सूक्ष्मत्व सिद्ध है और बुद्धिका भी आत्माके सदृश निर्मलत्व आदि सिद्ध है? इसलिये उसका आत्मचैतन्यके आकारसे आभासित होना बन सकता है। बुद्धिसे आभासित मन? मनसे आभासित इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंसे आभासित स्थूल शरीर है। इसलिये सांसारिक मनुष्य देहमात्रमें ही आत्मदृष्टि करते हैं। देहात्मवादी लोकायतिक? चेतनाविशिष्ट शरीर ही आत्मा है ऐसा कहते हैं? दूसरे? इन्द्रियोंको चेतन कहनेवाले हैं तथा कोई मनको और कोई बुद्धिको चेतन कहनेवाले हैं। कितने ही? उस बुद्धिके भी भीतर व्याप्त? अव्यक्तकोअव्याकृतसंज्ञक अविद्यावस्थ ( चिदाभास ) को आत्मरूपसे समझनेवाले हैं। बुद्धिसे लेकर शरीरपर्यन्त सभी जगह आत्मचैतन्यका आभास ही उनमें आत्माकी भ्रान्तिका कारण है। अतः ( यह सिद्ध हुआ कि ) आत्मविषयक ज्ञान विधेय नहीं है। तो क्या विधेय है नामरूप आदि अनात्मा वस्तुओंका जो आत्मामें अध्यारोप है उसकी निवृत्ति ही कर्तव्य है। आत्मचैतन्यका विज्ञान प्राप्त करना नहीं है क्योंकि ज्ञान? अविद्याद्वारा आरोपित समस्त पदार्थोंके आकारमें ही विशेषरूपसे ग्रहण किया हुआ है। यही कारण है कि विज्ञानवादी बौद्ध विज्ञानसे अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु ही नहीं है इस प्रकार मानते हैं और उस ज्ञानको स्वसंवेद्य माननेके कारण प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं मानते। सुतरां ब्रह्ममें जो अविद्याद्वारा अध्यारोप किया गया है? उसका निराकरणमात्र कर्तव्य है। ब्रह्मज्ञानके लिये प्रयत्न कर्तव्य नहीं है क्योंकि ब्रह्म तो अत्यन्त प्रसिद्ध ही है। ब्रह्म यद्यपि अत्यन्त प्रसिद्ध? सुविज्ञेय? अति समीप और आत्मस्वरूप है तो भी वह विवेकरहित मनुष्योंको? अविद्याकल्पित नामरूपके भेदसे उनकी बुद्धि भ्रमित हो जानेके कारण? अप्रसिद्ध? दुर्विज्ञेय? अति दूर और दूसरासा प्रतीत हो रहा है। परंतु जिनकी बाह्याकार बुद्धि निवृत्त हो गयी है? जिन्होंने गुरु और आत्माकी कृपा लाभ कर ली है? उनके लिये इससे अधिक सुप्रसिद्ध? सुविज्ञेय? सुखस्वरूप और अपने समीप कुछ भी नहीं है। प्रत्यक्षउपलब्ध धर्ममय इत्यादि वाक्योंसे भी यही बात कही गयी है। कितने ही अपनेको पण्डित माननेवाले यों कहते हैं कि आत्मतत्त्व निराकार होनेके कारण उसको बुद्धि नहीं पा सकती अतः सम्यक् ज्ञाननिष्ठा दुःसाध्य है। ठीक है? जो गुरुपरम्परासे रहित हैं? जिन्होंने वेदान्तवाक्योंको ( विधिपूर्वक ) नहीं सुना है? जिनकी बुद्धि सांसारिक विषयोंमें अत्यन्त आसक्त हो रही है? जिन्होंने यथार्थ ज्ञान करानेवाले प्रमाणोंमें परिश्रम नहीं किया है? उनके लिये यही बात है। परंतु जो उनसे विपरीत हैं? उनके लिये तो? लौकिक ग्राह्यग्राहक भेदयुक्त,वस्तुओंमें सद्भाव सम्पादन करना ( इनको सत्य समझना ) अत्यन्त कठिन है क्योंकि उनको आत्मचैतन्यसे अतिरिक्त दूसरी वस्तुकी उपलब्धि ही नहीं होती। यह ठीक इसी तरह है? अन्यथा नहीं है। यह बात हम पहले सिद्ध कर आये हैं और भगवान्ने भी कहा है कि जिसमें सब प्राणी जागते हैं? ज्ञानी मुनिकी वही रात्रि है इत्यादि। सुतरां आत्मस्वरूपके अवलम्बनमें? बाह्य नानाकार भेदबुद्धिकी निवृत्ति ही कारण है क्योंकि आत्मा कभी किसीके भी लिये अप्रसिद्ध? प्राप्तव्य? त्याज्य या उपादेय नहीं हो सकता। आत्माको अप्रसिद्ध मान लेनेपर तो सभी प्रवृत्तियोंको निरर्थक मानना सिद्ध होगा। इसके सिवा न तो यह कल्पना की जा सकती है कि अचेतन शरीरादिके लिये ( सब कर्म किये जाते हैं ) और न यही कि सुखके लिये सुख है या दुःखके लिये दुःख है क्योंकि सारे व्यवहारका प्रयोजन अन्तमें आत्माके ज्ञानका विषय बन जाना है। इसलिये? जैसे अपने शरीरको जाननेके लिये अन्य प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है? वैसे ही आत्मा उससे भी अधिक अन्तरतम होनेके कारण आत्माको जाननेके लिये प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं है अतः यह सिद्ध हुआ कि विवेकियोंके लिये आत्मज्ञाननिष्ठा सुप्रसिद्ध है। जिनके मतमें ज्ञान निराकार और अप्रत्यक्ष है उनको भी? ज्ञेयका बोध ( अनुभव ) ज्ञानके ही अधीन होनेके कारण? सुखादिकी तरह ही ज्ञान अत्यन्त प्रसिद्ध है? यह मान लेना चाहिये। तथा ज्ञानको जाननेके लिये जिज्ञासा नहीं होती इसलिये भी ( यह मान लेना चाहिये कि ज्ञान प्रत्यक्ष है ) यदि ज्ञान अप्रत्यक्ष होता? तो अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी तरह उसको भी जाननेके लिये इच्छा की जाती? अर्थात् जैसे ज्ञाता ( पुरुष ) घटादिरूप ज्ञेय पदार्थोंका ज्ञानके द्वारा अनुभव करना चाहता है? उसी तरह उस ज्ञानको भी अन्य ज्ञानके द्वारा जाननेकी इच्छा करता? परंतु यह बात नहीं है।


सुतरां ज्ञान अत्यन्त प्रत्यक्ष है और इसीलिये ज्ञाता भी अत्यन्त ही प्रत्यक्ष है। अतः ज्ञानके लिये प्रयत्न कर्तव्य नहीं है? किंतु अनात्मबुद्धिकी निवृत्तिके लिये ही कर्तव्य है इसीलिये ज्ञाननिष्ठा सुसंपाद्य है।।50।।