Sbg 18.50 hcchi
Jump to navigation
Jump to search
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda ।।18.50।। पूर्व श्लोक में नैर्ष्कम्य सिद्धि के लक्ष्य को इंगित किया गया है। अब उस साधना के विवेचन का प्रकरण प्रारम्भ होता है? जिसके अभ्यास से परमात्मस्वरूप में दृढ़निष्ठा प्राप्त हो सकती है। इस श्लोक में आगे के कथनीय विषय की प्रस्तावना की गयी है। सिद्धि को प्राप्त पुरुष से तात्पर्य उस साधक से है? जिसने स्वधर्माचरण से अन्तकरण की शुद्धि प्राप्त कर ली है। ऐसा ही साधक ब्रह्मप्राप्ति का अधिकारी होता है। आगे के कुछ श्लोक हमें स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षणों का स्मरण कराते हैं? जिनका वर्णन गीता के द्वितीय अध्याय में किया गया था।ध्यानाभ्यास का विस्तृत विवेचन षष्ठाध्याय में किया जा चुका है। अत यहाँ केवल संक्षेप में ही वर्णन किया जायेगा।भगवान् श्रीकृष्ण आगे कहते हैं