Sbg 18.45 htshg
Jump to navigation
Jump to search
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.45।।परंतु दूसरे कारणसे ( उनका प्रकारान्तरसे अनुष्ठान करनेपर ) यह अब बतलाया जानेवाला फल होता है --, कर्माधिकारी मनुष्य? उक्त लक्षणोंवाले अपनेअपने कर्मोंमें अभिरत -- तत्पर हुआ? संसिद्धि लाभ करता है अर्थात अपने कर्मो का अनुष्ठान करनेसे अशुद्धिका क्षय होनेपर? शरीर और इन्द्रियोंकी ज्ञाननिष्ठाकी योग्यतारूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है। तो क्या अपने कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे ही साक्षात् संसिद्धि मिल जाती है नहीं। तो किस तरह मिलती है अपने कर्मोंमें तत्पर हुआ मनुष्य? जिस प्रकार सिद्धि लाभ करता है? वह तू सुन।