Sbg 18.43 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.43।।शौर्यशूरवीरता? तेज दूसरोंसे न दबनेका स्वभाव? धृति -- धारणाशक्ति? जिस शक्तिसे उत्साहित हुए मनुष्यका सभी अवस्थाओंमें अनवसाद ( नाश या शोकका अभाव ) होता है? दक्षता -- सहसा प्राप्त हुए बहुतसे कार्योंमें बिना घबड़ाहटके प्रवृत्त होनेका स्वभाव तथा युद्धमें न भागनाशत्रुको पीठ न दिखानेका भाव। दान -- देनेयोग्य पदार्थोंको खुले हाथ देनेका स्वभाव और ईश्वरभाव यानी जिनका शासन करना है? उनके प्रति प्रभुत्व प्रकट करना। ये सब क्षत्रियोंके कर्म अर्थात् क्षत्रियजातिके लिये विहित उनके स्वाभाविक कर्म हैं।