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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.40।।इसके उपरान्त अब प्रकरणका उपसंहार करनेवाला श्लोक कहा जाता है --, ऐसा कोई सत्त्व? अर्थात् मनुष्यादि प्राणी या अन्य कोई भी प्राणरहित वस्तुमात्र? पृथिवीमें? स्वर्गमें अथवा देवताओंमें भी नहीं है? जो कि इन प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सत्त्वादि तीनों गुणोंसे मुक्त अर्थात् रहित हो। ऐसा कोई नहीं है इस पूर्वके पदसे इस वाक्यका सम्बन्ध है। क्रिया? कारक और फल ही जिसका स्वरूप है? ऐसा यह सारा संसार सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंका ही विस्तार है? अविद्यासे कल्पित है और अनर्थरूप है? ( पंद्रहवें अध्यायमें ) वृक्षरूपकी कल्पना करके ऊर्ध्वमूलम् इत्यादि वाक्योंद्वारा मूलसहित इसका वर्णन किया गया है। तथा यह भी कहा है कि उसको दृढ़ असङ्गशस्त्रद्वारा छेदन करके उसके पश्चात् उस परम पदको खोजना चाहिये। उसमें यह शङका होती है कि तब तो सब कुछ तीनों गुणोंका ही कार्य होनेसे संसारके कारणकी निवृत्ति नहीं हो सकती। इसलिये जिस उपायसे उसकी निवृत्ति हो? वह बतलाना चाहिये।