Sbg 18.35 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.35।।जिस धृतिके द्वारा मनुष्य स्वप्न -- निद्रा? भय -- त्रास? शोक -- दुःख और मदको नहीं छोड़ता। अर्थात् विषयसेवनको ही अपने लिये बहुत बड़ा पुरुषार्थ मानकर उन्मत्तकी भाँति मदको ही मनमें सदा कर्तव्यरूपसे समझता हुआ जो कुत्सित बुद्धिवाला मनुष्य इन सबको नहीं छोड़ता। यानी धारण ही किये रहता है। उसकी जो धृति है? वह तामसी मानी गयी है।