Sbg 18.30 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.30।।जो बुद्धि? प्रवृत्तिको -- बन्धनके हेतुरूप कर्ममार्गको और निवृत्तिको -- मोक्षके हेतुरूप संन्यासमार्गको जानती है। बन्ध और मोक्षके साथ प्रवृत्ति और निवृत्तिकी समानवाक्यता है? इससे यह निश्चय होता है कि प्रवृत्ति और निवृत्तिका अर्थ कर्म मार्ग और संन्यासमार्ग ही है। तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको -- विधि और प्रतिषेधको? यानी करनेयोग्य और न करनेयोग्यको ( भी जानती है )। यह कहना किसके सम्बन्धमें है देशकाल आदिकी अपेक्षासे जिनके दृष्ट और अदृष्ट फल होते हैं? उन कर्मोंके सम्बन्धमें। तथा जो बुद्धि भय और अभयको(जानती है )। जिससे मनुष्य भयभीत होता है? उसका नाम भय है और उससे विपरीतका नाम अभय है उन दोनोंको? यानी दृष्टादृष्टविषयक जो भय और अभय हैं उन दोनोंके कारणोंको जानता है? एवं हेतुसहित बन्धन और मोक्षको भी जानती है? हे पार्थ वह बुद्धि सात्त्विकी है। पहले जो ज्ञान कहा गया है? वह बुद्धिकी एक वृत्तिविशेष है और बुद्धि वृत्तिवाला है। धृति भी बुद्धिकी वृत्तिविशेष ही है।