Sbg 18.28 htshg
Jump to navigation
Jump to search
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.28।।जो कर्ता अयुक्त है -- जिसका चित्त समाहित नहीं है? जो बालकके समान प्राकृत -- अत्यन्त संस्कारहीन बुद्धिवाला है? जो स्तब्ध है -- दण्डकी भाँति किसीके सामने नहीं झुकता? जो शठ अर्थात् अपनी सामर्थ्यको गुप्त रखनेवाला कपटी है? जो नैष्कृतिक -- दूसरोंकी वृत्तिका छेदन करनेमें तत्पर और आलसी है -- जिसका कर्तव्यकार्यमें भी प्रवृत्त होनेका स्वभाव नहीं है? जो विषादी -- सदा शोकयुक्त स्वभाववाला और दीर्घसूत्री है -- कर्तव्यमें बहुत विलम्ब करनेवाला है अर्थात् आज या कल कर लेनेयोग्य कार्यको महीनेभरमें भी समाप्त नहीं कर पाता? जो ऐसा कर्ता है वह तामस कहा जाता है।