Sbg 18.26 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.26।।जो कर्ता मुक्तसङ्ग है -- जिसने आसक्तिका त्याग कर दिया है? जो निरहंवादी है -- जिसका मैं कर्ता हूँ ऐसे कहनेका स्वभाव नहीं रह गया है? जो धृति और उत्साहसे युक्त है -- धृति यानी धारणाशक्ति,और उत्साह यानी उद्यम -- इन दोनोंसे जो युक्त है? तथा जो किये हुए कर्मके फलकी सिद्धि होने या न होनेमें निर्विकार है। जो ऐसा कर्ता है? वह सात्त्विक कहा जाता है। जो केवल शास्त्रप्रमाणसे ही कर्ममें प्रयुक्त होता है? फलेच्छा या आसक्ति आदिसे नहीं? वह निर्विकार कहा जाता है।