Sbg 18.22 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.22।।जो ज्ञान? किसी एक कार्यमें? शरीरमें या शरीरसे बाहर प्रतिमादिमें? सर्ववस्तुविषयक सम्पूर्ण ज्ञानकी भाँति आसक्त है? अर्थात् ( यह समझता है कि ) यह आत्मा या ईश्वर इतना ही है इससे परे और कुछ भी नहीं है? जैसे दिगम्बर जैनियोंका ( माना हुआ ) आत्मा शरीरमें रहनेवाला और शरीरके बराबर है और पत्थर या काष्ठ ( की प्रतिमा ) मात्र ही ईश्वर है? इसी प्रकार जो ज्ञान किसी एक कार्यमें ही आसक्त है। तता जो हेतुरहित -- युक्तिरहित और तत्त्वार्थसे भी रहित है। यथार्थ अर्थका नाम तत्त्वार्थ है? ऐसा तत्त्वार्थ जिस ज्ञानका ज्ञेय हो? वह ज्ञान तत्त्वार्थयुक्त होता है और जो तत्त्वार्थयुक्त न हो वह अतत्त्वार्थवत् अर्थात् तत्त्वार्थसे रहित होता है। एवं जो हेतुरहित होनेके कारण ही अल्प है अथवा अल्पविषयक होनेसे या अल्प फलवाला होनेसे अल्प है? वह ज्ञान तामस कहा गया है क्योंकि अविवेकी तामसी प्राणियोंमें ही ऐसा ज्ञान देखा जाता है।।