Sbg 18.21 htshg
Jump to navigation
Jump to search
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.21।।और जो ज्ञान? सम्पूर्ण भूतोंमें भिन्नभिन्न प्रकारके भिन्नभिन्न भावोंको? आत्मासे अलग विलक्षण पृथक्रूपसे देखता है? अर्थात् प्रत्येक शरीरमें अलगअलग अपनेसे दूसरा आत्मा समझता है? उस ज्ञानको तू राजस यानी रजोगुणसे उत्पन्न हुआ जान। ज्ञानमें कर्तापन होना असम्भव है? इसलिये जो ज्ञान देखता है इसका आशय यह है कि जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य देखता है।