Sbg 18.20 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.20।।पहले ( तीन श्लोकोंद्वारा ) ज्ञानके तीन भेद कहे जाते हैं।


जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य? अव्यक्तसे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त भूतोंमें एकभाव -- एक आत्मवस्तु? जो कि अपने स्वरूपसे या धर्मसे कभी क्षय नहीं होता? ऐसा अविनाशी और कूटस्थ नित्यतत्त्व देखता है। यहाँ भाव शब्द वस्तुवाचक है। तथा ( जिस ज्ञानके द्वारा ) उस आत्मतत्त्वको अलगअलग प्रत्येक शरीरमें विभागरहित अर्थात् आकाशके समान समभावसे स्थित देखता है? उस ज्ञानको अर्थात् अद्वैतभावसे आत्मसाक्षात्कार कर लेनेको तू सात्त्विक ज्ञान पूर्ण ज्ञान जान। जो द्वैतदर्शनरूप अयथार्थ ज्ञान है? वे राजसतामस हैं? अतः वे संसारका उच्छेद करनेमें साक्षात् हेतु नहीं हैं।