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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.18।।इस प्रकार शास्त्रके आशयका उपसंहार करके अब कर्मोंका प्रवर्तक बतलाया जाता है --, ज्ञान -- जिसके द्वारा कोई पदार्थ जाना जाय। यहाँ ज्ञान शब्दसे सामान्यभावसे सर्व पदार्थविषयक ज्ञान कहा गया है। वैसे ही ज्ञेय अर्थात् जाननेमें आनेवाला पदार्थ? यह भी सामान्य भावसे समस्तका ही वर्णन है। तथा परिज्ञाता अर्थात् उपाधियुक्त अविद्याकल्पित भोक्ता? इस प्रकार जो यह इन तीनोंका समुदाय है? यही सामान्यभावसे समस्त कर्मोंकी प्रवर्तक तीन प्रकारकी कर्मचोदना है। क्योंकि उक्त ज्ञान आदि तीनोंके सम्मिलित होनेपर ही त्याग और ग्रहण आदि जिनके प्रयोजन हैं? ऐसे समस्त कर्मोंका आरम्भ होता है। अब अधिष्ठानादि पाँच हेतुओंसे जिसकी उत्पत्ति है तथा मन? वाणी और शरीररूप आश्रयोंके भेदसे जिसके तीन वर्ग किये गये हैं? ऐसे समस्त कर्म? करण आदि तीन कारकोंमें संगृहीत हैं। यह बात बतलायी जाती है -- करण -- जिसके द्वारा कर्म किया जाय? अर्थात् श्रोत्रादि दस बाह्य इन्द्रियाँ और बुद्धि आदि चार,अन्तःकरण। कर्म -- जो कर्ताका अत्यन्त इष्ट हो और क्रियाद्वारा सम्पादन किया जाय। कर्ता -- श्रोत्रादि करणोंको अपनेअपने व्यापारमें नियुक्त करनेवाला उपाधिस्वरूप जीव। इस प्रकार यह त्रिविध कर्मसंग्रह है। जिनमें कुछ संगृहीत किया जाय उसका नाम संग्रह है? अतः कर्मोंके संग्रहका नाम कर्मसंग्रह है क्योंकि इन तीन कारकोंमें ही कर्म संगृहीत है। इसलिये यह तीन प्रकारका कर्मसंग्रह है।