Sbg 18.16 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.16।।तत्र शब्द प्रकरणसे सम्बन्ध जोड़ता है। ऐसा होनेसे? यानी पहले बतलाये हुए पाँच कारणोंद्वारा ही समस्त कर्म सिद्ध होते हैं? इसलिये? जो अज्ञानी पुरुष? वेदान्त और आचार्यके उपदेशद्वारा तथा तर्कद्वारा संस्कृतबुद्धि न होनेके कारण? उन अधिष्ठानादि पाँचों कारणोंके साथ अविद्यासे आत्माकी एकता मानकर? उनके द्वारा किये हुए कर्मोंका मैं ही कर्ता हूं इस प्रकार केवलशुद्ध आत्माको ( उन कर्मोंका ) कर्ता समझता है? ( वह वास्तवमें कुछ भी नहीं समझता )। तथा आत्माको शरीरादिसे अलग माननेवाला भी? जो शरीरादिसे अलग केवल आत्माको ही कर्ता समझता है? वह भी अकृतबुद्धि ही है। अतः असंस्कृतबुद्धि होनेके कारण वह भी वास्तवमें आत्माका या कर्मका तत्त्व नहीं समझता? यह अभिप्राय है। इसलिये वह दुर्बुद्धि है। जिसकी बुद्धि कुत्सित? विपरीत? दुष्ट और बारम्बार जन्ममरण देनेमें कारणरूप हो उसे दुर्बुद्धि कहते हैं ऐसा मनुष्य देखता हुआ भी वास्तवमें नहीं देखता। जैसे तिमिररोगवाला अनेक चन्द्र देखता है? या जैसे बालक दौड़ते हुए बादलोंमें चन्द्रमाको दौड़ता हुआ देखता है? अथवा जैसे ( पालकी आदि ) किसी सवारीपर चढ़ा हुआ मनुष्य दूसरोंके चलनेमें अपना चलना समझता है ( वैसे ही उसका समझना है )।