Sbg 18.14 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.14।।वे ( पाँच कारण ) कौनसे हैं सो बतलाते हैं --, अधिष्ठान -- इच्छाद्वेष? सुखदुःख और ज्ञान आदिकी अभिव्यक्तिका आश्रय शरीर? कर्ता -- उपाधिस्वरूप भोक्ता जीव? भिन्नभिन्न प्रकारके कारण -- शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाले श्रोत्रादि अलगअलग बारह करण? नाना प्रकारकी चेष्टाएँ -- श्वासप्रश्वास आदि अलगअलग वायुसम्बन्धी क्रियाएँ और इन चारोंके साथ पाँचवाँ -- पाँचकी संख्याको पूर्ण करनेवाला कारण दैव है। अर्थात् चक्षु आदि इन्द्रियोंके अनुग्राहक सूर्यादि देव हैं।