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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.13।।इसलिये क्रिया? कारक और फल आदि आत्मामें अविद्यासे आरोपित होनेके कारण परमार्थदर्शी,( आत्मज्ञानी ) ही सम्पूर्ण कर्मोंका अशेषतः त्यागी हो सकता है। कर्म करनेवाले अधिष्ठान ( शरीर ) कर्ताक्रिया आदि कारकोंको? आत्मभावसे देखनेवाला अज्ञानी? सम्पूर्ण कर्मोंका अशेषतः त्याग नहीं कर सकता। यह बात अगले श्लोकसे दिखलाते हैं -- हे महाबाहो इनआगे कहे जानेवाले पाँच कारणोंको अर्थात् कर्मके साधनोंको? तू मुझसे जान। अगले उपदेशमें अर्जुनके चित्तको लगानेके लिये और अधिष्ठानादिके ज्ञानकी कठिनता दिखानेके लिये? उन पाँचों कारणोंको जाननेयोग्य बतलाकर? उनकी स्तुति करते हैं। जिस शास्त्रमें जाननेयोग्य पदार्थोंकी संख्या ( गणना ) की जाय उसका नाम सांख्य अर्थात् वेदान्त है। कृतान्त भी उसीका विशेषण है। कृत कर्मको कहते हैं ? जहाँ उसका अन्त अर्थात् जहाँ कर्मोंकी समाप्ति हो जाती है वह कृतान्त है -- यानी कर्मोंका अन्त है। यावानर्थ उदपाने सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने,परिसमाप्यते इत्यादि वचन भी आत्मज्ञान उत्पन्न होनेपर समस्त कर्मोंकी निवृत्ति दिखलाते हैं। इसलिये ( कहते हैं कि ) उस आत्मज्ञानप्रद कृतान्त -- सांख्यमें यानी वेदान्तशास्त्रमें समस्त कर्मोंकी सिद्धिके लिये कहे हुए ( उन पाँच कारणोंको तू मुझसे सुन )।
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