Sbg 17.2 htshg

From IKS BHU
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।17.2।।यह प्रश्न साधारण मनुष्योंके विषयमें है अतः इसका उत्तर बिना विभाग किये देना उचित नहीं? इस अभिप्रायसे श्रीभगवान् बोले --, जिस निष्ठाके विषयमें तू पूछता है? मनुष्योंकी वह स्वभावजन्य श्रद्धा अर्थात् जन्मान्तरमें किये हुए धर्मअधर्म आदिके जो संस्कार मृत्युके समय प्रकट हुआ करते हैं उनके समुदायका नाम स्वभाव है? उससे उत्पन्न हुई श्रद्धातीन प्रकारकी होती है। सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुई देवपूजादिविषयक श्रद्धा सात्त्विकी है? रजोगुणसे उत्पन्न हुई यक्षराक्षसादिकी पूजाविषयक श्रद्धा राजसी है और तमोगुणसे उत्पन्न हुई प्रेतपिशाच आदिकी पूजाविषयक श्रद्धा तामसी है। ऐसे तीन प्रकारकी श्रद्धा होती है। उस आगे कही जानेवाली ( तीन प्रकारकी ) श्रद्धाको तू सुन।