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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.3।।तथा --, तेज प्रागल्भ्य ( तेजस्विता )? चमड़ीकी चमक नहीं। क्षमा -- गाली दी जाने या ताड़ना दी जानेपर भी अन्तःकरणमें विकार उत्पन्न न होना। उत्पन्न हुए विकारको शान्ति कर देना तो पहले अक्रोधके नामसे कह चुके हैं। क्षमा और अक्रोधका इतना ही भेद है। धृति शरीर और इन्द्रियादिमें थकावट उत्पन्न होनेपर? उस थकावटको हटानेवाली जो अन्तःकरणकी वृत्ति है? उसका नाम धृति है? जिसके द्वारा उत्साहित की हुई इन्द्रियाँ और शरीर कार्यमें नहीं थकते। शौच दो प्रकारकी शुद्धि? अर्थात् मिट्टी और जल आदिसे बाहरकी शुद्धि? एवं कपट और रागादिकी कालिमाका अभाव होकर मनबुद्धिकी निर्मलतारूप भीतरकी शुद्धि? इस प्रकार दो तरह की शुद्धि। अद्रोह -- दूसरेका घात करनेकी इच्छाका अभाव? यानी हिंसा न करना। अतिमानिताका अभाव अत्यन्त मानका नाम अतिमान है? वह जिसमें हो वह अतिमानी है? उसका भाव अतिमानिता है? उसका जो अभाव है वह नातिमानिता है? अर्थात् अपनेमें अतिशय पूज्य भावनाका न होना। हे भारत अभय से लेकर यहाँतकके ये सब लक्षण? सम्पत्तियुक्त उत्पन्न हुए पुरुषमें होते हैं। कैसी सम्पत्तिसे युक्त पुरुषमें होते हैं जो दैवी सम्पत्तिको साथ लेकर उत्पन्न हुआ है? अर्थात् जो देवताओंकी विभूतिका योग्य पात्र है और भविष्यमें जिसका कल्याण होना निश्चित है? उस पुरुषके ये लक्षण होते हैं।