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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.21।।अब यह समस्त आसुरी सम्पत्तिका संक्षेप कहा जाता है। जिन ( कामादि ) तीन भेदोंमें? आसुरी सम्पत्तिके अनन्त भेद होनेपर भी सबका अन्तर्भाव हो जाता है? जिन तीनोंका नाश करनेसे सब दोषोंका नाश करना हो जाता है और जो सब अनर्थोंके मूल कारण हैं? उनका वर्णन किया जाता है --, आत्माका नाश करनेवाले? ये तीन प्रकारके दोष? नरकप्राप्तिके द्वार हैं। इनमें प्रवेश करनेमात्रसे ही आत्मा नष्ट हो जाता है? अर्थात् किसी पुरुषार्थके योग्य नहीं रहता। इसलिये ये तीनों आत्माका नाश करनेवाले द्वार कहलाते हैं। वे कौन हैं काम? क्रोध और लोभ। सुतरां इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये। क्योंकि ये काम आदि तीनों नरकद्वार आत्माका नाश करनेवाले हैं? इसलिये इनका त्याग कर देना चाहिये। यह त्यागकी स्तुति है।