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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.1।।उन तीनोंमें दैवी प्रकृति संसारसे मुक्त करनेवाली है? तथा आसुरी और राक्षसी प्रकृतियाँ बन्धन करनेवाली हैं? अतः यहाँ दैवी प्रकृति सम्पादन करनेके लिये और दूसरी दोनों त्यागनेके लिये दिखलायी जाती हैं -- श्रीभगवान् बोले --, अभयनिर्भयता? सत्त्वसंशुद्धि -- अन्तःकरणकी शुद्धि व्यवहारमें दूसरेके साथ ठगाई? कपट और झूठ आदि अवगुणोंको छोड़कर शुद्ध भावसे आचरण करना। ज्ञान और योगमें निरन्तर स्थिति -- शास्त्र और आचार्यसे आत्मादि पदार्थोंको जानना ज्ञान है और उन जाने हुए पदार्थोंका इन्द्रियादिके निग्रहसे ( प्राप्त ) एकाग्रताद्वारा अपने आत्मामें प्रत्यक्ष अनुभव कर लेना योग है। उन ज्ञान और योग दोनोंमें स्थिति अर्थात् स्थिर हो जाना -- तन्मय हो जाना? यही प्रधान सात्त्विकी -- दैवी संपद् है। और भी जिन अधिकारियोंकी जिस विषयमें जो सात्त्विकी प्रकृति हो सकती है वह कही जाती है -- दान -- अपनी शक्तिके अनुसार अन्नादि वस्तुओंका विभाग करना। दम -- बाह्य इन्द्रियोंका संयम। अन्तःकरणकी उपरामता तो शान्तिके नामसे आगे कही जायगी। यज्ञ -- अग्निहोत्रादि श्रौतयज्ञ और देवपूजनादि स्मार्तयज्ञ। स्वाध्याय -- अदृष्टलाभके लिये ऋक् आदि वेदोंका अध्ययन करना। तप -- शारीरिक आदि तप जो आगे बतलाया जायगा और आर्जव अर्थात् सदा सरलता सीधापन।