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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.18।।अहंकार -- हमहम करनेका नाम अहंकार है? जिसके द्वारा अपनेमें आरोपित किये हुए विद्यमान और अविद्यमान गुणोंसे अपनेको युक्त मानकर मनुष्य हम हैं ऐसा मानता है? उसे अहंकार कहते हैं। यह अविद्या नामका बड़ा कठिन दोष? समस्त दोषोंका और समस्त अनर्थमय प्रवृत्तियोंका मूल कारण है। कामना और आसक्तिसे युक्त? दूसरेका पराभव करनेके लिये होनेवाला बल? दर्प -- जिसके उत्पन्न होनेपर मनुष्य धर्मको अतिक्रमण कर जाता है? अन्तःकरणके आश्रित उस दोषविशेषका नाम दर्प है। तथा स्त्री आदिके विषयमें होनेवाला काम और किसी प्रकारका अनिष्ट होनेसे होनेवाला क्रोध? इन सब,दोषोंको तथा अन्यान्य महान् दोषोंको भी अवलम्बन करनेवाले होते हैं। इसके सिवा वे अपने और दूसरोंके शरीरमें स्थित? उनकी बुद्धि और कर्मके साक्षी? मुझ ईश्वरसे द्वेष करनेवाले होते हैं -- मेरी आज्ञाको उल्लङ्घन करके चलना ही मुझसे द्वेष करना है? वे वैसा करनेवाले हैं और सन्मार्गमें स्थित पुरुषोंके गुणोंको सहन न करके? उनकी निन्दा करनेवाले होते हैं।